इस्लाम में दीन और दुनियावी तालीम की अहमियत और फ़ायदे – कुरआन और हदीस की रोशनी में
इस्लाम में दीन और दुनियावी तालीम की अहमियत भूमिका इल्म (ज्ञान/तालीम) इंसान को वह मुकाम देता है जो किसी दौलत या ताक़त से हासिल नहीं हो सकता। इस्लाम ने इल्म को सिर्फ़ इबादत और दीन तक महदूद (सीमित) नहीं रखा, बल्कि दुनियावी तालीम और हुनर को भी इंसान की ज़िंदगी का अहम हिस्सा क़रार दिया। क़ुरआन और हदीस में इल्म को इमान के बाद सबसे बड़ी नेमत बताया गया है। आज के दौर में मुसलमानों के लिए ज़रूरी है कि वह दीन की तालीम भी हासिल करें और दुनियावी तालीम में भी पीछे न रहें, ताकि दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाबी मिले। इस्लाम में इल्म का मक़ाम क़ुरआन में अल्लाह तआला फ़रमाता है: قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ "कहो: क्या जानने वाले और न जानने वाले बराबर हो सकते हैं?" (सूरह अज़-ज़ुमर 39:9) यह आयत इल्म की अहमियत को साफ़ करती है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया: "Ilm talash karna har Muslim mard aur aurat par farz hai." (इब्ने माजा – हदीस 224) यहाँ "इल्म" सिर्फ़ नमाज़, रोज़ा या इबादत का इल्म ही नहीं बल्कि वह तमाम ज़रूरी ज्ञान है जिससे इंसान अपन...